गिन्नी की उड़ान (भाग 2)

कहानी अब तक 

गिन्नी ने बाहर एक दोस्त भी बना लिया – वो बड़ा ही सुन्दर था | गिन्नी रोज़ उसको कई बातें सुनाती पर वो कुछ जवाब न देता बस अनजान सा उड़ता रहता | पर गिन्नी को बुरा नहीं लगता था कि वो उसकी बातों का जवाब नहीं देता क्योंकि आज तक उसे या तोह उलटे जवाब मिले या चुप रहने को कहा गया- ज़्यादातर कोई उसकी सुनता ही न था | ये कम से कम उसकी बात सुनता तो था | और गिन्नी ने सोचा कि शायद वो बोल नहीं सकता | उसे ये न पता था कि उसका दोस्त तो एक डोर से बंधा हुआ है, एक बहुत पतली डोर जो आसानी से नहीं दिखती और जिसने कई चिड़ियों की जानें ली है और अभी इस दोस्त को अपने इशारों पे उदा रही है | इस सब से अनजान गिन्नी ने दोस्त को नाम भी दे दिया था – रंगीला |

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बगीचे में अब वो बागड़ को आके चिढ़ाती कि बाहर तो कोई ना मिला उससे जो उससे भी अच्छा उड़ना जानता हो | बिल्ला उससे यह कह के चुप करा देता कि अभी गई ही कितना दूर है तू !

एक दिन घर पे जब बात पता चली तो चारों को दांट पड़ी | गिन्नी और चिन्नी को तो कुछ दिन घर से बाहर ही ना निकलने दिया | गिन्नी की माँ ने आख़िर मे फिर गिन्नी को वही बात कही कि ” बेटा अच्छी चिड़िया बनना है तुम्हें ….. ‘ और बापू ने भी वही कहा कि “बेटा यह बगीचा ही तुम्हारी सारी दुनिया है … ” | गिन्नी के इलावा ब सबके सर से कुछ नया देखने का भूत उतर गया | अब फिर वापस गिन्नी उस छोटे नीम के पेड़ पर बैठकर दूर उड़ते हुए चील को देखती और दुखी होती |

एक दिन बागड़ उसके पास आया और कहा, ” एक तरीका है जिससे तू बाहर जा सकती बिना तेरे बॉडीगार्ड भाई को पता लगे |” ” तो फिर जल्दी बताओ न!” गिन्नी ने फुदकते हुए कहा  | 

“लेकिन उसके लिए रोज़ मेरा एक पंजा खाना पड़ेगा” बिल्ला बोला | गिन्नी एक क्या कई पंजे खाने को तैयार थी | तो ये तय हुआ कि सबको यह दिखाना है कि गिन्नी बागड़ के साथ खेल रही है और आख़िर में वह एक पंजा खाकर कहीं गिरी पड़ी है | इसमें चिन्नी ने साथ दिया- वो घर जाके ये बताती कि आज किस जगह पर गिरी हुई मिली गिन्नी | गिन्नी का भाई उड़ने में इतना तेज न था और वो बागड़ से भी बहुत डरता था, इसलिए वो दूर ही रहता | इस तरह गिन्नी की उड़ान फिर शुरू हो गई|

अब गिन्नी अकेली ज़्यादा दूर जाने लग गई | उसने एक नया और बड़ा बगीचा भी खोज निकाला जहाँ उनके तालाब से करीब पाँच गुणा बड़ा तालाब था और जिसमे सिर्फ़ मेंढक ही नहीं, कभी कभी भैंस भी दिख जाती और गिन्नी उनपे बैठके बड़ी खुश होती | यह सब बाते वो बागड़ और रंगीला को सुनाती और चिन्नी को भी | एक दिन बाहर हवा बड़ी ज़ोर से चल रही थी तो गिन्नी को बड़ी दिक्कत हुई उड़ने में | आते आते बहुत ज़्यादा थक गयी | घर पर भी सबको पता था कि तूफान आया था लेकिन बाहर, और गिन्नी को देखकर कोई भी कह देता कि वो तूफान में उड़के आ रही थी | घरवालों को शक हुआ और यह भी बात थी कि रोज़ वो कैसे बागड़  से पंजा खाकर आ रही थी ? 

तो एक बार फिर वही डाँट सुनने को मिली जब भाई से पता चला कि गिन्नी कहीं गायब रहती थी | आख़िर में माँ ने फिर कहा की ” बेटा अच्छी चिड़िया … ” और बापू ने कि  ” बेटा यह बगीचा ही … “. वो उससे बहुत प्यार करते थे और उसे खोने का डर उन्हें बहुत परेशान करता था | वो भी यही सोचते रहते कि इसे कैसे समझाया जाए | अभी तो गुस्से में गिन्नी का अपने घर से बाहर जाना बंद था और यह भी कह दिया था कि इसकी शादी करवा के ही अब तो इस नीम से कहीं और जाने दिया जाएगा | करीब दो हफ्ते रोज़ रोने के बाद एक दिन गिन्नी आख़िर निकल ही गई घर से और छोटे नीम के आगे जाने के बाद ही उसने देखा कि कोई उसे देख रहा ह या नहीं | अगर बीच में रुक जाती तो देख पाती कि बिल्ला उसको रोकने के लिए पीछे पीछे दौड़ रहा था पर वो तो पूरी तेज़ी से निकल गयी और अब बिल्ला कहाँ ही उसकी बराबरी कर पाता |

गिन्नी ने सोचा कि पहले रंगीला से मिलके उसे सब बताएगी कि अब वो वापस बगीचे में नहीं जाने वाली और पूछेगी कि क्या वो उसके साथ रह सकती है ? आज उसको रंगीला मिल नहीं रहा था क्योंकि बहुत सारे रंगीला जैसे दिखने वाले लोग आसमान में उड़ रहे थे | फिर उसे थोड़ी दूर रंगीला नज़र आया, वो चिल्लाती हुई उसकी तरफ गई पर रास्ते में वो पतली डोर आ गई और गिन्नी के गले से लेकर पेट तक एक चीरा लगा गई |गिन्नी के पंख बंद पड़ गए और वो सीधा नीचे की ओर आने लगी | नीचे रास्ते पे वो बेहोश पड़ी रही | कुछ देर बाद उसे लगा जैसे कि कोई उसे अपने मुँह मे लेकर दौड़ रहा है | गिन्नी को वो उसका आखिरी दिन लगा |फिर जब होश आया तो उसने अपने आप को अपने घर में पाया | दो दिन बाद जब वो पूरी तरह से होश में आई तो चिन्नी ने उससे बताया कि बागड़ उसे रास्ते से उठाके लाया | वो उसे बाहर उड़ने जाने से रोक रहा था क्योंकि उस दिन पतंग उड़ाने का उत्सव मनाया जा रहा था पर गिन्नी बागड़ को सुन न पाई | डॉक्टर चाचा ने कहा कि घाव दो हफ़्तो में भर जाएगा कोई चिंता करने की बात नहीं है, बस आराम करे गिन्नी |

गिन्नी अब अपने कमरे में ही रहती और ज़्यादातर सोती रहती | उसे बाहर से कई आवाज़ें आती रहती, जैसे की घर में , कोई लड़ाई हो रही हो पर जब भी कोई उससे मिलने आता तो ऐसा बिल्कुल भी न लगता की कोई लड़ रहा था | एक दिन रात को जब सब सोने जा रहे थे तो गिन्नी ने अपनी माँ और भाई को बहुत दुखी देखा पर पूछ न पाई कि क्या हुआ | अगले दिन जब वो नींद से उठी तो उसके कन्धों में बहुत दर्द हो रहा था | उसने जब देखने की कोशिश की तो उसे अपने पंख न नज़र आए और वो चकरा के बेहोश हो गई |

जब उठी तो सब घर वाले और कुछ दोस्त आस पास खड़े थे | कुछ चुप थे तो कुछ कह रहे थे की यह सब तेरे भले के लिए ही किया है बेटा | भाई पीछे रो रहा था | फिर माँ पास आई और बोली, वही पुरानी बात कि ” बेटा एक अच्छी चिड़िया बनना है तुम्हे, चीज़ो और लोगों को पहचाना सीखो ताकि कौन कब काम आ सके यह पता चले | अब तुम्हे अपना परिवार बनाना है , तुम बहुत कुछ कर सकती हो इस बगीचे में | अपने बच्चों के साथ खेलना, उन्हें पढ़ाना और कहानी सुनना | “

तभी गिननी ने अपने आखिरी शब्द कहे ” किसकी कहानी माँ ?”.

रवि मीणा
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