गिन्नी की उड़ान (भाग 1)

तो कहानी कुछ ऐसी है की एक बगीचा था जहाँ कई सारे छोटे मोटे जानवर रहते थे | वहां कई सारे पेड़ पौधे भी थे और एक सुन्दर छोटा सा तालाब था जहाँ सिर्फ मेंढक रहते थे | सब राज़ी ख़ुशी रहते थे | कभी कभी छोटे मोटे झगड़े होते भी तो आपस में सुलझ जाते, और उनका साधारण सा जीवन हमेशा की तरह चलता रहता | इस बगीचे में एक बरगद  का पेड़ था जहाँ कई प्रकार के चिड़ियों ने अपने घोंसले बनाये थे | उन्ही में से एक परिवार की कहानी है ये |

उस चिड़ियों के परिवार में सबसे छोटी थी गिन्नी | एक दिन वह बगीचे के बाहरी दीवार के किनारे वाले छोटे नीम के पेड़ की एक डाली पर बैठकर आसमान में उड़ते हुए एक चील को देख रही थी | ये लगातार तीसरा दिन था उसका उस नीम की डाली पर | पर पिछले दो दिन से उसके दिमाग में जो बातें घूम रही थीं वो आज न थी | कल और परसों तो उसकी माँ की बातें उसके दिमाग में घूम रहीं थी

” बेटा एक अच्छी चिड़िया बनना है तुम्हे- अच्छे से उड़ना सीखो ताकि अपने और घर के लिए खाना ला सको | चीज़ों और लोगों को पहचानना सीखो ताकि पता लग सके कौन कहाँ काम आएगा | अच्छी बातें करना सीखो ताकि लोग तुम्हे पसंद करे- और फिर, अच्छा लड़का भी तो ऐसे ही थोड़ी मिल जाता है? जब तुम्हारे बच्चे होंगे तोह उनके साथ खेलना, उन्हें पढ़ाना और कहानी सुनाना |”

कहानी सुनाना – ये सुनते ही गिन्नी मन ही मन में सोचती कि माँ, एक कहानी बना रही हु मैं खुद की जो बड़े अच्छे से सुनाऊँगी अपने बच्चों को |

उसके बापू कहते रहते, ” बेटा, ये बगीचा ही तुम्हारी सारी दुनिया है- इसके बाहर मत जाना क्योंकि वहाँ बहुत खतरा है, बहुत बुरे लोग रहते हैं जो किसी से भी प्यार नहीं करते- और कुछ तो तुम्हे जान से मारने को हमेशा तैयार रहते हैं| “

मगर आज वो ऐसा कुछ भी नहीं सोच रही थी | आज तो उसको बस ये ध्यान में आ रहा था कि वो अपने बगीचे में सबसे अच्छा उड़ना सीख गयी है-यहाँ तक कि अब तो वो बागड़ बिल्ला भी उसे नहीं पकड़ पाता | बिल्ली मौसी का छोटा भाई था बागड़ बिल्ला- पता नहीं क्यों पर वो शाकाहारी था, और इस बात से बिल्ली मौसी भी कभी कभी परेशान रहती थी | लेकिन अपना बागड़ बिल्ली मौसी की बातों पर ध्यान नहीं देता था और खुद ही में खुश रहता था | वह चिड़ियों के पीछे भागता रहता, उन्हें पकड़के एक पंजा मार कर  गिराता और फिर उन्हें वहीँ छोड़ देता |

रोज़ की यही कहानी थी | इस खेल में बिल्ले और चिड़िया दोनों को मज़ा भी बहुत आता था | जब बिल्ला थक कर सो जाता तो कुछ चिड़ियाँ जान बुझ कर उसे परेशान करने आ जाती ताकि वो उनका पीछा करे | कुछ एक दो ही थी जो कभी कभी उसके हाथ नहीं आ पाती थी | इनमे गिन्नी के इलावा उसकी दोस्त चिन्नी शामिल थी | चिन्नी का घर पड़ोस के आम के पेड़ में था और वो दोनों साथ खेलते हुए बड़ी हुई थीं | ख़ास दोस्ती होने के बाद भी दोनों एक दूसरे से बहुत अलग थीं – यहाँ चिन्नी को अपने बगीचे के इलावा कुछ सूझता नहीं और गिन्नी का तो मन बाहर की दुनिया देखने में ही लगा रहता |

तीसरे दिन जब गिन्नी छोटे नीम के पेड़ से लौटी तो बहुत खुश थी- जैसे कुछ मिल गया हो | अगले दिन वो छोटे नीम पर नहीं गयी- पूरे दिन  बागड़ बिल्ले को अपना पीछा कराती रही | बिल्ला भी गुस्से में आ गया और आखिर उसने गिन्नी को एक पंजा मार ही दिया | बिल्ले को वो आज उदास लगी, पर उसके पूछने पर गिन्नी ने कोई जवाब न दिया| अगले दिन फिर गिन्नी बिल्ले को अपना पीछा करवाने लग गयी और आज तो बिल्ले ने अपना पूरा ज़ोर लगा दिया फिर भी पकड़ न पाया गिन्नी को | जब जाने का समय आया तो गिन्नी ने बागड़ से पूछा ” जब मैंने तुमसे पिछली बार कहा था कि मैं सबसे तेज़ हु उड़ने में क्योंकि मैंने तुम्हे हरा दिया, तो तुमने कहा था कि तुम तो कुछ भी नहीं इस बगीचे के बाहर. तो आज क्या लगता है- हु न मैं बनी बाहर के लिए?” बिल्ला समझ गया कि गिन्नी क्यों दुखी थी और उसने कहा ” बाहर जाके देख सब पता चल जाएगा” |

बगीचे में बाहर जाने की बात कोई नही करता था- बाहर जाने की बात सुनना ही सबको चौंका देता था | कुछ लोग बाहर जाते भी थे तो बस तब जब कोई ज़रूरी काम होता था- पर तब भी चिड़ियाँ नहीं जाती थी, सिर्फ चिड़े जाते थे | गिन्नी ने अब तोह बाहर जाने की बात करके चिन्नी और कुछ और दोस्तों का भी मन बाहर कुछ नया देख के आने का कर ही दिया था | तो एक दिन गिन्नी, चिन्नी, गोकू और रोनू सबसे छुपते छुपाते चले ही गए उस छोटे नीम के आगे | डर के साथ साथ एक अजीब सी ख़ुशी थी उनमें | बाहर उन्होंने कई चीज़ें नयी देखीं- नए घर, नए लोग, नए मैदान, नए पेड़ | बाहर जाने का चस्का अब बड़ा ही ज़ोर लग गया था उन्हें, तो जब भी मौका मिलता चारों निकल लेते |

गिन्नी ने बाहर एक दोस्त भी बना लिया – वो बड़ा ही सुन्दर था | गिन्नी रोज़ उसको कई बातें सुनाती पर वो कुछ जवाब न देता बस अनजान सा उड़ता रहता | पर गिन्नी को बुरा नहीं लगता था कि वो उसकी बातों का जवाब नहीं देता क्योंकि आज तक उसे या तोह उलटे जवाब मिले या चुप रहने को कहा गया- ज़्यादातर कोई उसकी सुनता ही न था | ये कम से कम उसकी बात सुनता तो था | और गिन्नी ने सोचा कि शायद वो बोल नहीं सकता | उसे ये न पता था कि उसका दोस्त तो एक डोर से बंधा हुआ है, एक बहुत पतली डोर जो आसानी से नहीं दिखती और जिसने कई चिड़ियों की जानें ली है और अभी इस दोस्त को अपने इशारों पे उदा रही है | इस सब से अनजान गिन्नी ने दोस्त को नाम भी दे दिया था – रंगीला |

टू बी कंटीनियूड 

रवि मीणा
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